भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या 

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • महाराष्ट्र का खाद्य एवं औषधि प्रशासन खाद्य पदार्थों में मिलावट के विरुद्ध व्यापक कार्रवाई का नेतृत्व कर रहा है। यह भारत में बढ़ती खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताओं और अधिक कठोर प्रवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

खाद्य पदार्थों में मिलावट

  • यह वह प्रक्रिया है जिसमें खाद्य पदार्थों में जानबूझकर किसी पदार्थ को मिलाया जाता है अथवा लापरवाही या अनुचित रख-रखाव के कारण खाद्य पदार्थ दूषित हो जाते हैं।
  • मिलावटी पदार्थ हानिकारक रसायन या अपेक्षाकृत हानिरहित भराव पदार्थ हो सकते हैं, जिन्हें उत्पादन प्रक्रिया के किसी भी चरण में मिलाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसानों द्वारा दूध में जल मिलाना या खाद्य तेल में खनिज तेल मिलाना खाद्य मिलावट के उदाहरण हैं।
  • खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में विद्यमान है।

प्रभाव

  • खाद्य पदार्थों में मिलावट से पाचन संबंधी विकार, एलर्जी, पोषण संबंधी कमियाँ, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली तथा कैंसर और यकृत क्षति जैसी दीर्घकालिक बीमारियों सहित कई स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष असुरक्षित भोजन के कारण लगभग 60 करोड़ लोग खाद्यजनित बीमारियों से प्रभावित होते हैं और 4.20 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
  • पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे वैश्विक खाद्यजनित बीमारी के भार का लगभग 40% वहन करते हैं, जबकि विश्व की कुल जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी केवल लगभग 9% है।

खाद्य सुरक्षा को नियंत्रित करने वाले प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मानक एवं रूपरेखाएँ

  • FAOLEX: यह खाद्य, कृषि और नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित राष्ट्रीय कानूनों एवं विनियमों के विश्व के सबसे बड़े डिजिटल संग्रहों में से एक है।
  • स्वच्छता एवं पादप-स्वच्छता उपाय (SPS): यह खाद्य सुरक्षा तथा पशु एवं पादप स्वास्थ्य मानकों के लिए मूलभूत नियम निर्धारित करता है। यह देशों को अपने मानक निर्धारित करने की अनुमति देता है। SPS समझौता 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना के साथ प्रभावी हुआ।
  • कोडेक्स एलीमेंटेरियस : इसे ‘खाद्य संहिता’ के नाम से भी जाना जाता है। यह कोडेक्स एलीमेंटेरियस आयोग द्वारा अपनाए गए मानकों, दिशानिर्देशों और कार्यप्रणाली संहिताओं का संग्रह है। कोडेक्स एलीमेंटेरियस आयोग, FAO और WHO का संयुक्त अंतर-सरकारी निकाय है। वर्तमान में इसके 189 सदस्य हैं और भारत भी इसका सदस्य है।
  • अंतरराष्ट्रीय पादप संरक्षण अभिसमय (IPCC): इसका उद्देश्य विश्व के पौधों, कृषि उत्पादों और प्राकृतिक संसाधनों को पादप कीटों से होने वाली हानि से बचाना है। यह एक अंतर-सरकारी संधि है। इसे 185 पक्षकार देशों द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है और भारत भी इसका एक पक्षकार है।

भारतीय रूपरेखा

  • खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006: इसका उद्देश्य खाद्य सुरक्षा एवं मानकों से संबंधित सभी मामलों के लिए एकल संदर्भ बिंदु स्थापित करना है। इसके अंतर्गत बहु-स्तरीय और बहु-विभागीय नियंत्रण व्यवस्था से हटकर एकल कमान व्यवस्था की ओर बढ़ने का प्रावधान किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) तथा प्रत्येक राज्य के लिए राज्य खाद्य सुरक्षा प्राधिकरणों की स्थापना की गई।
  • FSSAI: भारत सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय FSSAI का प्रशासनिक मंत्रालय है। इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थित है। FSSAI खाद्य सुरक्षा के नियमन और निगरानी के लिए उत्तरदायी है। यह खाद्य उत्पादों, विशेषकर उन प्रमुख खाद्य पदार्थों एवं वस्तुओं की समय-समय पर अखिल भारतीय निगरानी करता है, जिनमें मिलावट की संभावना अधिक होती है।
  • खाद्य सुरक्षा और मानक नियम, 2011: इनमें खाद्य सुरक्षा अपीलीय न्यायाधिकरण और अपीलीय न्यायाधिकरण के रजिस्ट्रार का प्रावधान किया गया है। साथ ही, जैविक खाद्य के लिए खाद्य सुरक्षा मानकों का प्रावधान तथा खाद्य विज्ञापन का विनियमन भी किया गया है।

भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण पहल

  • ईट राइट इंडिया आंदोलन: इसका उद्देश्य देश की खाद्य प्रणाली में ऐसा परिवर्तन लाना है, जिससे सभी भारतीयों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और सतत भोजन सुनिश्चित किया जा सके। यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के अनुरूप है, जिसमें निवारक एवं स्वास्थ्यवर्धक देखभाल पर बल दिया गया है। यह आयुष्मान भारत, पोषण अभियान, एनीमिया मुक्त भारत और स्वच्छ भारत मिशन जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के साथ भी जुड़ा हुआ है।
  • ईट राइट स्टेशन प्रमाणन: यह FSSAI द्वारा उन रेलवे स्टेशनों को प्रदान किया जाता है, जिन्होंने यात्रियों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के संबंध में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के अनुरूप निर्धारित मानक स्थापित किए हैं।
  • राज्य खाद्य सुरक्षा सूचकांक (SFSI): FSSAI द्वारा विकसित यह सूचकांक खाद्य सुरक्षा के चयनित मानदंडों के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रदर्शन को मापने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। SFSI प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए वार्षिक रूप से जारी किया जाता है। यह खाद्य सुरक्षा के पाँच प्रमुख आयामों पर राज्यों के प्रदर्शन का आकलन करता है। इनमें मानव संसाधन एवं संस्थागत आँकड़े, अनुपालन, खाद्य परीक्षण, अवसंरचना एवं निगरानी तथा प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण और उपभोक्ता सशक्तीकरण शामिल हैं।
  • षट्भुजाकार चेतावनी लेबल: FSSAI ने अधिक मात्रा में चीनी, नमक या संतृप्त वसा वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर लाल रंग के षट्भुजाकार चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव दिया है, ताकि उपभोक्ता सूचित विकल्प चुन सकें।
  • इसके अतिरिक्त, हालिया सुधारों के अंतर्गत स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम, 2014 के अंतर्गत पहले से पंजीकृत रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को अब स्वतः FSSAI-पंजीकृत माना जाता है, जिससे दोहरी पंजीकरण प्रक्रिया समाप्त हो गई है।

चुनौतियाँ

  • कमजोर परीक्षण अवसंरचना: देशभर में खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की संख्या कम है और उनमें से कई में भारी धातुओं, कीटनाशकों या जीवाणुओं की जाँच करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है (संसदीय स्थायी समिति)।
  • कमजोर निगरानी: एक संसदीय समिति ने उल्लेख किया कि केवल 2% निरीक्षणों में गैर-अनुपालन सामने आया। यह अत्यंत कम आँकड़ा वास्तविक खाद्य सुरक्षा की स्थिति के बजाय संभावित रूप से अपर्याप्त पहचान एवं निगरानी की ओर संकेत करता है।
    • विशाल असंगठित क्षेत्र अब भी प्रभावी निगरानी के दायरे से काफी हद तक बाहर है।
  • संसाधनों की कमी: खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की कमी सुदृढ़ विधिक ढाँचे के बावजूद प्रवर्तन को कमजोर करती है।
  • भ्रामक विपणन: न्यूट्रास्यूटिकल और सप्लीमेंट क्षेत्र में नियामकीय कमियों का लाभ उठाकर “क्लिनिकली टेस्टेड” या “आयुर्वेदिक” जैसे अप्रमाणित दावों का उपयोग किया जाता है।

निष्कर्ष

  • भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को कारोबार सुगमता के लिए विनियमन में ढील और सुदृढ़ प्रवर्तन के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
  • प्रमुख प्राथमिकताओं में मान्यता प्राप्त खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं का विस्तार, खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के रिक्त पदों को भरना, आपूर्ति शृंखला में ट्रेसेबिलिटी (स्रोत से अंतिम उपभोक्ता तक वस्तु की निगरानी) को एकीकृत करना तथा 2026 के सुधारों के अंतगर्त पहले से उपलब्ध सरल पंजीकरण व्यवस्था के माध्यम से असंगठित खाद्य विक्रेताओं को औपचारिक दायरे में लाना शामिल होना चाहिए।

विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस
  • विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस प्रत्येक वर्ष 7 जून को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य खाद्यजनित जोखिमों की रोकथाम, पहचान और प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा आवश्यक कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2018 में इस महत्वपूर्ण विषय के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस की स्थापना की।
  • WHO और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) सदस्य देशों तथा अन्य हितधारकों के सहयोग से संयुक्त रूप से विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस के आयोजन का समन्वय करते हैं।
  • विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस 2026 की थीम है: “भार से समाधान की ओर – प्रत्येक जगह सुरक्षित भोजन।”

Source: IE

 

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